शोभित जैन
क्रिसमस और नव-वर्ष की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ २००९ की आखिरी पेशकश :


जिम्मेदारी का पाउडर डाल, ज़माने की मशीन में घुमाया भी,
चितवन की धुप, गेसुओं की हवा में सुखाया भी,
'अधूरेपन' के जिद्दी दाग से पीछा छुड़ा नहीं पाया,
ज़िन्दगी, तेरा रंग कुछ उड़ा-उड़ा लगता है !!!

ग़ज़लों-शेरों की आंच पर तपाया भी,
विदेशी मसालों का तड़का लगाया भी,
"सुकूँ" को नमक बनाके पर मिला नहीं पाया,
ज़िन्दगी, तेरा स्वाद कुछ फीका फीका लगता है !!!

ममता की माटी के नीचे दबाया भी,
यार-दोस्ती का खाद-पानी पिलाया भी,
"नूर-ए-मुहब्बत" पर मैं दिखा नहीं पाया,
ज़िन्दगी, तेरा पौधा कुछ सूखा सूखा लगता है !!!
शोभित जैन
शाम के चार बजे , दिल के तार बजे ...

हर ध्वनि लगे शहनाई
मन मधुवन में मचले अमराई
नवंकृत हो मचले तरुणाई
रहस्यमयी मुस्कान अधरों पर सजे...
शाम के चार बजे, दिल के तार बजे ...

रुनझुन
-रुनझुन करती धड़कन ,
सांसों में है अपनापन,
दिल दिमाग में चलती अनबन,
प्राण जा कहीं और बसे...
शाम के चार बजे , दिल के तार बजे ...

रातें
हो गयीं गुमसुम-गुमसुम
हो गए सारे हवास भी गुम,
जाने कौन हो कहाँ हो तुम ?
जिससे मिलने मनवा तरसे
शाम के चार बजे , दिल के तार बजे ...

शाम के चार बजे , दिल के तार बजे ...

(
हिंदी से प्रेम करने और हिंदी में प्रेम करने का एक प्रयास .. )
शोभित जैन
कुछ समय पहले एक फिल्म देखी थी "लव आजकल" तो सोचा उसी फिल्म को अपने शब्दों में अपने ब्लॉग पर रिलीज़ किया जाये ....वैसे भी आजकल रीमेक का समय चल रहा है तो क्यूँ ना हम भी अपने हाथ आजमां लें ...अपने अंदाज़ में .....बस उस फिल्म और इस फिल्म में इतना ही अंतर है की उसमें दो कहानियों के दो अलग अलग हीरो थे ...और इसमें दोनों के लेखक और हीरो एक ही हैं जो "Love कल" की खोज में हैं पर जिंदा रहने के लिए "Love आज" से दिल बहला रहें हैं ...

Love आज :-
लड़कियां छेड़ते नहीं, हम पटाने के लिए
बस कुछ किस्से बनाते हैं, दोस्तों को सुनाने के लिए


तस्वीरें किसी की दिल में आज कौन रखता है
फिर भी तस्वीर तेरी चाहिए, पर्स में लगाने के लिए

लबों पर उसका नाम आया नहीं अचानक
एक शिगूफा छेड़ा था, तुझे जलाने के लिए

रूठना तो हुस्न की अदा है और हक भी
हजारों तरीके हम भी रखते हैं, मनाने के लिए

(तो यह है जनाब आज का Love जिसने "Emotions " को अत्याचार और इश्क को कभी "कमबख्त" तो कभी "कमीना" बना दिया .... अब चलतें है उस उस दौर की तरफ जहाँ इश्क को इबादत मानकर जिया जाता था ....)

Love कल :-
तबियत भी ठीक थी , दिल भी बेकरार था
वो वक्त और था, जब किसी से प्यार था !
होश में रहते थे हम , आँखों में यूं खुमार था
अदायों से अनजान थे , पागलो में शुमार था !!
वो वक्त और था .....

बेसब्र तो पहले भी बहुत थे हम ,
हर वक्त किसी का यूं इंतज़ार था
तसवीरें भी बहुत देखी थी मगर ,
हर तस्वीर के लिए दिल दीवार था !!
वो वक्त और था .....

बात निगाहों से होकर दिल तक पहुँचेगी,
इल्म इसका हमको सरकार था !
खता होनी थी सो हो गई निगाहों से ,
दोनों में कोई कसूरवार था !!
वो वक्त और था...

वो वक्त और था , जब किसी से प्यार था .............
शोभित जैन
ईद मुबारक,
बाकी लोगों का तो पता नहीं पर ये ईद मेरे शायद मुबारक होगी .. दिन की छुट्टी मिली है तो इतनी तो उम्मीद की ही जा सकती है ... Kingdom of Saudi Arabia में होने का ये फायदा तो है.. पुरे दिन का आराम ... हाँ फायदे के साथ कुछ नुकसान भी हैं जैसे ये दिन की छुट्टी तो मिल गयी पर इसमें कुछ करने या कहीं घूमने को है नहीं... बस कुछ नए ब्लॉग शुरू किये हैं उन्ही को समय देने का प्लान है जिनमे एक "Travelog" है एक "Photos " के लिए है और एक दो और ..... इन ब्लोग्स को बनाने का मन तो कई दिनों से था पर समय अब जाकर मिला . अभी नीव तो डाल दी है ईमारत खड़ी करना और रंगरोगन का काम बाकी है .. काम पूरा होते ही आप लोगो के सामने पेश किया जायेगा बाकायदा पार्टी-शार्टी के साथ ...

चलिए जब तक आप लोग इस नयी ग़ज़ल का आनंद लीजिये :-

दूध की बोतल छुट गई , दाम देखकर
दारू साथ ही रह गई , शाम देखकर ॥१॥

मक्कारी , दिखावा झूठ तरक्की पा गए
और काम मिल गया, काम देखकर ॥२॥

सादगी
, सीरत , और अदाएं गज़ब की
मरने को जी चाहता है, इंतजाम देखकर ॥३॥

लाज बचाने की खातिर , थाने चली गयी
होश फाख्ता हो गए, अंजाम देखकर ॥४॥


चलने की आदत में थकने की फुर्सत कहाँ

रूह को सुकूँ मिलेगा अब तो, 'मुक्तिधाम' देखकर ॥५॥

ये ग़ज़ल लिख तो दी है पर मैं स्वयं इससे पूरी तरह संतुष्ट नहीं हूँ (खासकर आखिरी शेर से) .. अपने अग्रजों से इसे सुधारने के अनुरोध के साथ इसे पोस्ट कर रहा हूँ ...
शोभित जैन
ये शीर्षक मेरी ग़ज़ल के लिए नहीं मेरे लिए है...क्यूंकि ब्लॉगजगत में मेरा आना जाना बरसाती मेढकों कि तरह ही है ...क्या करें इस खानाबदोश ज़िन्दगी में कभी कभार ही अपने लिए समय चुरा पाते हैं फिर भी लगता है ये बरसात अगले कुछ महीने चलती रहेगी ... उसके आगे कुछ नहीं कह सकता ... तो चलिए फिर से शुरुआत करते हैं इस ग़ज़ल (ग़ज़ल सिर्फ़ कहने को , मात्रा - व्याकरण का ज्ञान नहीं है ना ) के साथ .....


जिनसे उम्मीद थी , वो दिलासा दे रहे
बुरे दिन फिर नज़र आने लगे !!!!

हमने तो सच से परदा उठाया था ,
दोस्त नहीं हो सकते, जिन्हें ताने लगे !!!!

बाहें फैलाकर चंद खुशियाँ माँगी थीं
'गम' ज़माने भर के समाने लगे !!!!

गाय, चूल्हा , तालाब और 'वो'
उफ़, कैसे कैसे ख्वाब आने लगे !!!!

कुछ और अज़ीज़ हो गए ज़माने के,
जब से परदेश में कमाने लगे !!!!


चिट्ठाचर्चा भी देखें : http://anand.pankajit.com/2009/10/blog-post_17.html
शोभित जैन
मौसी : जय बेटा , तो मैं ये शादी पक्की समझूँ ...

जय : बुरा मत मानना मौसी पर जवान दोस्त का सवाल है ये तो पूछना ही पड़ता है कि लड़की करती क्या है , खर्च कितना करती है ..
मौसी : खर्च करने का जहां तक सवाल है बेटा , एक बार शादी हो जाये पति बच्चों की जिम्मेदारी जाये तो खर्च भी कम हो जायेगा ...

जय :तो क्या इसका मतलब यह है कि अभी बहुत खर्च करती है ...
मौसी : अरे नहीं नहीं ये मैंने कब कहा , पर अब रोज़ रोज़ तो घर में meggi बनाकर नहीं खा सकते ना ... कभी कभी तो होटलों में जाना ही पड़ता है .. वैसे वो एक Week में बस चार पॉँच बार ही बाहर का खाना खाती है ...

जय :रोज़ रोज़ Meggi मतलब क्या खाना पकाना भी नहीं आता इतनी कामचोर है ...
मौसी : छि छि कामचोर और वो ऐसा मैंने कब कहा पर Late Night Movie देखने के बाद कोई खाना पका पाता है क्या ?

जय :Late Night movies बस यही एक कमी बच गयी थी तुम्हारी बसंती में ....
मौसी : अरे बेटा एक बार शादी हो गयी तो वो दोस्तों के साथ Disco's में जाना बंद कर देगी , Movies Theater अपने आप बंद हो जायेंगे , वैसे मेरी बसंती लक्ष्मी हैलक्ष्मी ....

जय :एक बात तो माननी पड़ेगी मौसी तुम्हारी बसंती लाख खर्चीली सही पर तुम्हारे मुंह से उसके लिए एक भी गलत शब्द नहीं निकला ...
मौसी : क्या करूँ बेटा मेरा तो दिल ही ऐसा है .... तो मैं ये शादी पक्की समझूँ ...
शोभित जैन

२० जुलाई : ये तारीख आते ही BOSS लोगों को एक ही चीज याद आती है "आम" रसीले आम .... BOSS बोले तो "Boys Of Sainik School"... और इन BOSS लोगों में कई लोग ऐसे हैं जो दुनिया के किसी भी कोने में हों आज के दिन "Mango Party" ज़रूर Enjoy करते हैं क्यूंकि आज है हमारे स्कूल का स्थापना दिवस ...
आप लोगों ने मेरा स्कूल तो देखा होगा ... नहीं ... चलिए कोई बात नहीं इस पेज के साइड में नज़र डाल लीजिये....Slide show का नाम है "घर ही तो था"...यही वो जगह है यहाँ ज़िन्दगी के सबसे सुहाने सात साल बिताये हैं ....इसी जगह ने इन पैरों को दुनिया के उबड़-खाबड़ रास्तों पर चलना सिखाया .. सैनिक छावनियों, युद्धपोतों, पनदुब्बियों से लेकर "२६ जनवरी" पर राजपथ तक का सफ़र सिर्फ और सिर्फ इसी की देन है .... कभी कभी सोचता हूँ तो लगता है कि मेरी सोच, सपने, अहसास, विचार सब यहीं की उपज है और आज भी उसी शिद्दत से इससे जुड़े हुए हैं ... लगता है कि सैनिक स्कूल से तो मैं आठ साल पहले निकल आया पर शायद मेरे अन्दर से सैनिक स्कूल अभी तक नहीं निकला है ....

हो सकता है मेरी ये नज़्म पढ़कर आपको भी मेरी बातों पर विश्वास हो जाये ...


अधूरी ख्वाहिश


जाम , शाम , निगाहें, अदाएं, माना सब आगोश में..
दिल में क्यूँ भला फिर , एक तन्हाई सी पलती है

दौलत, शोहरत, इज्ज़त, मुकद्दर से सब हासिल हुई,
कंधों पर सितारों की कमी लेकिन फिर भी खलती है


गीत, ग़ज़ल, छन्द, नज़्म, छोड़ चला मैं जाऊंगा ,
तिरंगा ओढ़ जाने की हसरत दिल में सदा मचलती है


किसी को ज़मीं, आसमां किसी को, बंटवारा शायद हो चुका,
सब कुछ पा लेने की ख्वाहिश, शायद मेरी गलती है


दिल बहलाने को 'शोभित' ख़्याल हमने भी पाल लिया ,
ये दुनिया का दस्तूर है प्यारे , दुनिया यूँ ही चलती है


चलिए चलते चलते इस Vedio पर भी नज़र-ऐ-इनायत करते जाईये , जो हमारे कुछ छोटे भाईयों ने कुछ सुहाने पलों को कैद करके बनाया है ....


शोभित जैन
काफी दिन हो गए कुछ लिखे हुए, और इन दिनों में काफी कुछ हो भी गया .... जैसे दुबई ( UAE) से तबादला हो गया .. पिरामिडों और nile नदी के देश EGYPT में .. ... एक hindustaan का trip हो गया ..... कुछ दिन अपना शहर इंदौर भी घूम लिया और बहुत सी यादें भी समेट लाये ..... सब कुछ एक ही पोस्ट में लिखना तो मुमकिन नहीं है, इसलिए आज सिर्फ़ इस यात्रा की सबसे खूबसूरत यादों का ज़िक्र करता हूँ .... UAE और EGYPT का ज़िक्र किसी और दिन... (हो सकता है की नए ब्लॉग में... क्यूंकि बहुत दिनों से मन है एक Travel blog बनाने का ) ... चलो मुद्दे की बात पर आते हैं ... तो इस बार इंदौर यात्रा की दो सबसे बड़ी उपलब्धियां रही एक पुरानी डायरी का मिलना और दूसरा एक नए दोस्त का मिलना ... डायरी के पन्ने तो एक एक करके आने वाली पोस्ट में खुलेंगे .... आज की पोस्ट और नज़्म उस मोहतरमा की नज़र करते हैं जिनसे पहली ही मुलाकात में दोस्ती हो गई [ सिर्फ़ दोस्ती :( ]और फिर शतरंज की बिसात पर बातों का ऐसा सिलसिला चला की शाम कब रात में बदल गई, और रात कब सुबह के आगोश में चली गई पता ही नहीं चला ... सुबह जब सूरज की पहली किरण ने झकझोरा तब बातों का सिलसिला टूटा ...... इसलिए इस बार इंदौर से चेन्नई की वापसी यात्रा कठिन भी रही और खुशगवार भी .... चलिए आप लोग भी हमारे साथ यात्रा कीजिये बातें तो होती रहेंगी.....

दाल आधी गल गयी .....

चेहरे पर तन्हाई का आलम अब किस्सा पुराना है,
एक मासूम मुस्कान से इसकी रंगत बदल गई ॥

उससे ही सुकून मिला और कुछ बेकरारी भी,
एक खवाहिश पूरी हुई, एक हसरत मचल गई ॥

मुकम्मल हुआ भरोसा कुछ और मुकद्दर पर
जब देर से ही सही दाल आधी गल गई ॥

जोश था, जूनून था और शायद ज़रुरत भी,
सब कुछ था, बस समय की कमी खल गयी ॥


शह बिना मात मिली पर बाज़ी अधूरी रही,
कमबख्त रात बेसब्र थी, बहुत जल्दी ढल गई ॥
शोभित जैन
आज यादों के झरोखे से फिर एक कविता (तुकबंदी) निकाल कर लाया हूँ...कालिज कि कैंटीन में चाय पीते पीते बस यूँ ही हाथ चले और कागज पर कुछ लिख दिया ...
आज मन किया तो ब्लॉग पर भी छाप रहा हूँ...

दीदार
सावन के महीने में...जब दिल धड़का था सीने में,
नशा बाकी बचा पीने में, मजा आने लगा जीने में,
उन दिनों यह बात हुई,
कालेज में पहली मुलाकात हुई...
हुस्न जैसे जमीं पर उतर आया था,
हूर थी या कोई अप्सरा का साया था...
तारीफ को शब्द मिले किताबों में,
आने लगी फिर वो, हर रात ख्वाबों में...
हर रोज़ वो कालेज में सीढ़ी के पास मिलती थी,
शायद वो किसी का इंतज़ार करती थी..
शायद वो भी किसी से प्यार करती थी,
या खुदा वो उससे यूँ ही प्यार करती रहे..
हर रोज़ उसका वहीँ इंतज़ार करती रहे..
हमारा दिल भी बेकरार होता रहे..
कुछ हो हो दीदार होता रहे..

या खुदा करना कबूल गर पाकीज़गी हो फरियाद में,
एक हसीं किस्सा जुड़ जायेगा हमारे कालिज कि याद में....

नोट:- इस कविता के सभी पात्र एवं घटनाएं काल्पनिक हैं, यदि किसी जीवित व्यक्ति से इसका सम्बन्ध पाया जाता है तो इसे हमारी खुशकिस्मती समझा जाये (संयोग नहीं)
शोभित जैन

२३ मार्च २००९ :-

पूरा दिन बीत गया पर चंद ब्लोग्स को छोड़कर शहीद दिवस पर कोई हलचल नज़र नहीं आई ..... आती भी कैसे ये कोई वैलेंटाइन डे थोड़े ही था .... और अपने आस पास जिसको भी इस की अहमियत बताई किसी ने कान नहीं दिया .... तब किसी कवि की ये पक्तियां याद आई

डूबे थे लोग कभी, वन्देमातरम में॥

डूबे तो है आज भी, बन्दे मात्र रम में

कोई साथ पाकर सोचा चलो शहीद दिवस भी youtube के साथ ही मना लेते हैं ...... फिल्मों के जरिये उन महान लोगों को याद किया और दिन ख़तम .... पर रात भर दो शब्द हथोडे की तरह दिमाग में बजते रहे ... इन्कलाब जिंदाबाद .........

क्या जादू रहा होगा उन दो शब्दों में यही सोचते सोचते आँख लग गई ..... पर सोने से पहले एक सपना देखा (सोने के बाद तो सभी देखते हैं ) ... सपना क्या है एक ज़रूरत है ... ज़रूरत है हमारे देश की ..... कभी आपको भी अपने ज़रूरी कामों से थोडी सी फुर्सत मिले तो सोचना ज़रूर ....... शायद ये आपकी भी जरूरत हो ....

एक और इन्कलाब

चिर निद्रा से जाग पड़ें अब, सुबह का सूरज लाल कर दें

चलो फिर से इन्कलाब कर दें...

चिंगारिया हर जगह छुपी हैं, राख के इस ढेर में,

चलो उठ एक साथ भभकें आग का सैलाब कर दें ....

चलो फिर से इन्कलाब कर दें...

जाति, वर्ण औ क्षेत्र भूलकर, गद्दारों पर टूट पड़ें,

एक ओर 'शोभित' हल्ला बोले, एक तरफ़ इख्लाक कर दें ...

चलो फिर से इन्कलाब कर दें...

घर में गर घुसे रहे तो, घर तलक जल जाएगा,

देहरी लांघें, सड़कें मापें, चौराहों तक फैलाब कर दें ....

चलो फिर से इन्कलाब कर दें...

है नहीं आसाँ बदलना, देश की तकदीर को...

चोट से नहीं वोट से सही, कैसे भी हो कमाल कर दें...

चिर निद्रा से जाग पड़ें अब, सुबह का सूरज लाल कर दें
चलो फिर से इन्कलाब कर दें...

शोभित जैन

दो साल पुरानी बात है जब मैं रायपुर से एक दोस्त की बहन की शादी अटेंड करके लौट रहा था...बोरियत से बचाने के लिए एक किताब भी साथ में थी..पर किस्मत शायद मुझपर कुछ ज़्यादा ही मेहरबान थी.. क्योंकि कुछ ही स्टेशन के बाद पूरी ट्रेन पर विभिन्न राज्यों की बॅडमिंटन टीमों ने कब्जा कर लिया .. और अलग अलग डिब्बों के हिस्से आए अलग अलग राज्यों के खिलाड़ी... मेरे हिस्से (मेरे डिब्बे में) आए हरियाणा के छोरे, पंजाब के पुत्तर और कश्मीर की कलियाँ... थोड़ी देर सब कुछ सामान्य चलता रहा, फिर शुरू हुआ गाने- बजाने और शेरो-शायरी का दौर....बस फिर क्या थी थोडी देर में हमने भी अपनी टूटी फूटी शायरी से उनके बीच अच्छी जगह बना ली... ख़ैर शाम तो अच्छी बीती और खाना खाकर हम अपनी बर्थ पर गए पढने के लिए... पर ये क्या किताब की जगह डायरी क्यूँ हाथ में गई ... शायद ये उन दो निगाहों का असर था जो बरबस ही तीन चार बार मेरी निगाहों से टकरा गई (सिर्फ़ यूँ ही..बिल्कुल वैसे ही जैसे चलते फिरते हजारों लोगो से टकराती हैं )... पर एक कवि का क्या है... कल्पना ही तो करनी थी सो कर डाली... और कुछ ही समय में एक कविता लिख ही डाली... और सुबह भोपाल पर ट्रेन से उतरने से पहले मोहतरमा को थमा भी दी... उसके बाद क्या हुआ कृपया पूछना मत ...मैं बता नहीं पाउँगा (क्यूंकि मुझे भी नहीं मालूम...मैं तो ट्रेन से उतर गया था) .... अब इतना लिख ही दिया है तो वो कविता भी आप सबके सामने पेश कर देता हूँ :-



हसरतों को समझो नही अब होश रहने दो,

निगाहें बात करती है लबों को खामोश रहने दो !!

आवारा हूँ मैं, आवारगी आदत मेरी,

पहचान दुनिया में यही शायद मेरी,

इकरार न करो, खानाबदोश रहने दो॥

निगाहें बात करती है लबों को खामोश रहने दो !!


धीरे-धीरे बात आगे बढ़ जायेगी

आशिकी अपनी हद से गुज़र जायेगी,

आशिक की हसरत को सरफरोश रहने दो

निगाहें बात करती है लबों को खामोश रहने दो !!

शोभित जैन
ना तो कोई नटखट चितवन, ना कोई हमजोली है ,
तुम उड़ालो रंग अबीरा , मैं कैसे कह दूँ होली है ?

बदरंग है अबकी ये होली, भंग तलक नहीं घोली है,
तुम उड़ालो रंग अबीरा , मैं कैसे कह दूँ होली है ?

'अनछुए
रुखसार' , दोस्त-रिश्तेदार, कहाँ गई वो टोली है,
तुम उड़ालो रंग अबीरा , मैं कैसे कह दूँ होली है ?

सुबह नहाकर दफ्तर गया, आकर एक फाइल खोली है ,
तुम उड़ालो रंग अबीरा , मैं कैसे कह दूँ होली है ?

सुन के खुश है 'अगली बार जरुर', माँ कितनी भोली है ,
तुम उड़ालो रंग अबीरा , मैं कैसे कह दूँ होली है ?
शोभित जैन

ब्लॉगजगत के कारण काफी दिनों से बहुत ही खूबसूरत रचनाएं, नज्में और गज़लें पढने को मिल रही हैं...पर जब भी मेरे जेहन में एक छोटी सी कविता कोंधती है, जो मुझे चार छोटी-छोटी प्यारी सी बच्चियों ने अपनी तोतली जुबान में सुनायी थी तो मैं यह सोचकर दंग रह जाता हूँ कि इतनी गहरी बात इतने सरल शब्दों में कोई कैसे लिख सकता है हो सकता है कि इसको पढने के बाद आप भी मेरे विचार से सहमत हों :-


एक था राजा, एक थी रानी..

दो थे बच्चे, एक थी नानी.....

राजा मारा लडाई में....
रानी मरी कढाई में....

नानी मरी रजाई में....

और बच्चे मरे पढाई में.....
शोभित जैन
कुछ समय पहले लिखी हुई ये नज़्म मुझे आज भी उतनी ही ताज़ा लगती है जितनी ये पहली बार पढने में लगी थी....आशा है आप लोगो को भी पसंद आएगी !!

काफिर नही होता...

जिस चेहरे को हया का रंग हासिल नहीं होता,
वो नाम हुस्न वालो में शामिल नहीं होता !!!!

हुस्न की चाहत ही खुदा की इबादत है,
मानते गर तुम, तो मैं काफिर नही होता !!!!

मुहब्बत पाने दिल में हिम्मत चाहिए हुज़ूर,
तोहफे की शक्ल में इश्क हाज़िर नही होता !!!!

खताएं तो होंगी , गर आशिकी ताज़ा है॥
क्योंकि जो सच्चा होता है, वो माहिर नहीं होता !!!!

पन्ने तो कई रंगे स्याही से, पर
जिसपर लिखा उसी पर जाहिर नही होता !!!!


(दोस्तों, आज सभी ब्लॉगर बंधुओं से माफ़ी मांगने का दिल कर रहा है, क्यूंकि पिछले कुछ समय से अतिव्यस्तता के चलते किसी भी रचना पर अपनी टिपण्णी नहीं दे पाया हूँ.. बहुत से रचनाकारों के तराशे हुए नायाब मोतियों को अपनी "google reader list " के जरिये पढ़ तो रहा हूँ पर उसके आनंद को व्यक्त नही कर पा रहा हूँ.......)

क्षमाप्रार्थी:-
शोभित जैन
शोभित जैन
पिछली पोस्ट पर आदरणीया संगीता पुरी जी की एक टिपण्णी मिली....टिपण्णी क्या एक प्रश्न पुछा था

बस उसी का जबाब देने की कोशिश की है इस पोस्ट
में.......



मयस्सर नहीं था...

जिसके बिना ज़िंदगी में मेरा गुज़र नही था,

बस वही तो इस जहाँ मे मयस्सर नहीं था !!!!



दिल में संजो रखूं यादों को,

सुहाना ऐसा तो कोई सफर नही था !!!!



ऐश की ज़िंदगी बिताते रहे बंगलों में,

सुकून की साँस लेने कोई घर नहीं था !!!!



साँसे टूटी मंजिल से कुछ फासले पर,

चन्द लम्हों का खुदा को सबर नहीं था !!!!



ज़िंदगी भर भटका आसरे की तलाश में,

लोग कहते रहे की वो बेघर नहीं था !!!!
शोभित जैन

फरबरी २००८ : चेन्नई एअरपोर्ट

लो भाई आख़िर एक किसान का बेटा आज एयरपोर्ट तक पहुँच ही गया...ट्रक्टर से एयरबस तक के सफर की कुछ खट्टी मीठी यादें अपने सूटकेस में भरकर, उसका एक हिस्सा हाथों में थामे हकीकत की ज़मीन पर घिसटते हुए मैं एअरपोर्ट की लॉबी मैं घुस गया....पर बहुत खोजने पर भी पहली उड़ान का उत्साह खोज नही पाया...शायद तन्हाई का अहसास उस उमंग पर भारी पड़ गया था........

नियत समय पर नियत स्थान से होते हुए नियत सीट पर बैठ गया...सब कुछ नियत....दिल मे बैठे बच्चे को खेलने की कोई जगह नहीं.........पता नही इंसान मशीनों को चला रहे है या मशीनें इंसानों को.....खैर......

नकली मुस्कान चेहरे पर चिपकाये लोगों के द्वारा स्वागत हुआ...और थोडी देर मे सीट बेल्ट बांधने का निर्देश गया......और उड़ने की खवाहिश ने ज़माने की रवायतों को अपने चारों ओर लपेट लिया........और फिर धीरे धीरे उड़ान की आकांक्षा मे ज़िन्दगी पहियों की तरह घिसने लगी......जैसे-जैसे यान रफ़्तार पकड़ रहा था चीज़ें पीछे छूट रही थीं......शायद गति का एक नियम ये भी है की हम जितने गति से आगे बढ़ते हैं उतनी ही गति से चीजें पीछे छूट जाती हैं, और जो चीज जितने नज़दीक होती है वो सबसे पहले और सबसे तेज़ जुदा होती है..और जो हमसे जितने फासले पर होता है उतना देर हमारे साथ रहता है........ धीरे - धीरे लुका- छिपी खेलने वाले मकान, फर्राटे से बाइक दौड़ने वाली सड़कें, और जश्न मनाने वाले शहर छोटे होते होते नज़रों से ओझल हो गए और पहुँच गए हम आकाश के अनंत ऊँचाई को मापने.........ऊँचाई चंद पलों की

शोभित जैन
ये है ब्लॉगजगत और हम सब ब्लॉगर.....पर ये है क्या और क्यूँ हम अपना समय यहाँ लगाते हैं....क्या ये एक ज़िम्मेदारी है ? या एक सुविधा ? या एक हथियार कुछ भी करने के लिए, कुछ भी कहने के लिए.......इसी उधेड़बुन में बहुत समय खपा दिया.....पर जब मंथन हुआ है तो गरल या अमृत कुछ तो निकलना ही था तो कुछ निकला...और जो निकला वो आपके सामने रख रहा हूँ....पता नहीं ये क्या है...पर जो भी है आपके सामने है..पढिये और हो सके तो मुझे भी बताइए....
जहाँ तक मेरा विचार है तो मुझे लगता है की हम लोग इस ब्लॉगजगत में भी ज़िन्दगी को कुछ अलग तरह से जी सकते हैं...कुछ इस तरह.....

चलो ज़िन्दगी को लफ्जों में सजाएं...
सुख को जोडें, दुःख घटाएं....

शब्दों को तपाकर मलहम कर दें, फिर

किसी के आँसू चुराएँ , किसी के दर्द सहलाएं...
चलो ज़िन्दगी को...


सच को कहना हुनर ही नहीं जिगर भी है,

आओ आइना बनें , समाज को शक्ल दिखाएं...
चलो ज़िन्दगी को...


ये सफर ख़त्म नहीं होगा, किसी मंजिल के बाद
कभी रास्तों की नियामत निहारें, थोड़ा सुस्तायें...
चलो ज़िन्दगी को...

हम क़द्र करते हैं तुम्हारे हुनर की,
छोटी सी टिपण्णी से उसे भी बताएं...
चलो
ज़िन्दगी को...

चलो ज़िन्दगी को लफ्जों में सजाएं...
सुख को जोडें, दुःख घटाएं....