शोभित जैन
ईद मुबारक,
बाकी लोगों का तो पता नहीं पर ये ईद मेरे शायद मुबारक होगी .. दिन की छुट्टी मिली है तो इतनी तो उम्मीद की ही जा सकती है ... Kingdom of Saudi Arabia में होने का ये फायदा तो है.. पुरे दिन का आराम ... हाँ फायदे के साथ कुछ नुकसान भी हैं जैसे ये दिन की छुट्टी तो मिल गयी पर इसमें कुछ करने या कहीं घूमने को है नहीं... बस कुछ नए ब्लॉग शुरू किये हैं उन्ही को समय देने का प्लान है जिनमे एक "Travelog" है एक "Photos " के लिए है और एक दो और ..... इन ब्लोग्स को बनाने का मन तो कई दिनों से था पर समय अब जाकर मिला . अभी नीव तो डाल दी है ईमारत खड़ी करना और रंगरोगन का काम बाकी है .. काम पूरा होते ही आप लोगो के सामने पेश किया जायेगा बाकायदा पार्टी-शार्टी के साथ ...

चलिए जब तक आप लोग इस नयी ग़ज़ल का आनंद लीजिये :-

दूध की बोतल छुट गई , दाम देखकर
दारू साथ ही रह गई , शाम देखकर ॥१॥

मक्कारी , दिखावा झूठ तरक्की पा गए
और काम मिल गया, काम देखकर ॥२॥

सादगी
, सीरत , और अदाएं गज़ब की
मरने को जी चाहता है, इंतजाम देखकर ॥३॥

लाज बचाने की खातिर , थाने चली गयी
होश फाख्ता हो गए, अंजाम देखकर ॥४॥


चलने की आदत में थकने की फुर्सत कहाँ

रूह को सुकूँ मिलेगा अब तो, 'मुक्तिधाम' देखकर ॥५॥

ये ग़ज़ल लिख तो दी है पर मैं स्वयं इससे पूरी तरह संतुष्ट नहीं हूँ (खासकर आखिरी शेर से) .. अपने अग्रजों से इसे सुधारने के अनुरोध के साथ इसे पोस्ट कर रहा हूँ ...
शोभित जैन
ये शीर्षक मेरी ग़ज़ल के लिए नहीं मेरे लिए है...क्यूंकि ब्लॉगजगत में मेरा आना जाना बरसाती मेढकों कि तरह ही है ...क्या करें इस खानाबदोश ज़िन्दगी में कभी कभार ही अपने लिए समय चुरा पाते हैं फिर भी लगता है ये बरसात अगले कुछ महीने चलती रहेगी ... उसके आगे कुछ नहीं कह सकता ... तो चलिए फिर से शुरुआत करते हैं इस ग़ज़ल (ग़ज़ल सिर्फ़ कहने को , मात्रा - व्याकरण का ज्ञान नहीं है ना ) के साथ .....


जिनसे उम्मीद थी , वो दिलासा दे रहे
बुरे दिन फिर नज़र आने लगे !!!!

हमने तो सच से परदा उठाया था ,
दोस्त नहीं हो सकते, जिन्हें ताने लगे !!!!

बाहें फैलाकर चंद खुशियाँ माँगी थीं
'गम' ज़माने भर के समाने लगे !!!!

गाय, चूल्हा , तालाब और 'वो'
उफ़, कैसे कैसे ख्वाब आने लगे !!!!

कुछ और अज़ीज़ हो गए ज़माने के,
जब से परदेश में कमाने लगे !!!!


चिट्ठाचर्चा भी देखें : http://anand.pankajit.com/2009/10/blog-post_17.html