शोभित जैन
आज रह रह कर किसी कि कही हुई दो पंक्तियाँ जेहन में आ रही है :-

इंसानियत का तकाजा किताबों में पढ़ा था,
आज किसी की मौत भी खबर बन गयी है ||

शोभित जैन


पूरी बस्ती, हर मंजर , हर नज़ारा धुला सा है
और साँस लेने को सारा , आसमा भी खुला सा है
फिर जाने किस याद में साँस मेरी जमी सी है....
सब कुछ है यहाँ , पर शायद कुछ कमी सी है ................

जन्नत के सुख कदमों पर है , और अरमान सारे बाहों में
कामयाबी का भी हर रास्ता बिछा हुआ है राहों में
फिर क्यों आंखों की कोरो में ठहरी कुछ नमी सी है ....
सब कुछ है यहाँ , पर शायद कुछ कमी सी है ................

उल्लास के आधार पर दिन जाते हैं गुजरते ,
और रात के स्वपन सारे , मखमली गद्दों पर लरजते
फिर धड़कन में क्यों बैचेनी जमी सी है ...
सब कुछ है यहाँ , पर शायद कुछ कमी सी है ................


कमी शायद उन रिश्तों की है जो हमारी जान हैं ,
ये बात उन रिश्तों की है , जो इंसान की पहचान हैं ...
वो रिश्ते जिसमे एक माँ बिन कारन भूखी रहती है ,
और बाप का गला रुधता पर आँखें सूखी रहती हैं....
दिन, महीने, और घंटे गिनती , रिश्ता उस बहन से है
अपनेपन का अहसास दिलाता , रिश्ता इस वतन से है
दोस्तों के ठहाकों से रिश्ता, रिश्ता सजती महफ़िल से ,
और लौटने की (विदेश से) दुआ मांगता , रिश्ता है हर एक दिल से
पैर छूते छोटो से रिश्ता , आशीष देते बड़ों से है ,
और सबसे बढ़कर के रिश्ता , रिश्ता अपनी जड़ो से है

दुआ मांगता हूँ में रब से , इन रिश्तों को में भूल न जाऊं
और टूटकर अपनी जड़ से , सदा के लिए दूर न जाऊँ


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शोभित जैन
बहुत कशमकश के बाद आख़िर मैंने फ़ैसला किया की मेरा पहला नजराना उस नज़र की नजर होना चाहिए , जिसने मेरे जीवन को अहसास और अहसासों को लफ्ज़ दिए
मैं तहे दिल से आभारी हूँ , उन दो निगाहों का जिसने मेरे जज्बातों की ज़मीन पर अहसासों के फूल खिलाये
मेरी पहली कविता मेरी चंद लम्हों की सफलतम प्रेम कहानी के नाम
जिसकी आज भी यादें शेष हैं .......

तबियत भी ठीक थी , दिल भी बेकरार न था...
वो वक्त और था, जब किसी से प्यार न था

होश में रहते थे हम , आँखों में यूं खुमार न था ....
अदायों से अनजान थे , पागलो में शुमार न था वो वक्त और था .....

बेसब्र तो पहले भी बहुत थे हम ,
पर हर वक्त किसी का यूं इंतज़ार न था
तसवीरें भी बहुत देखी थी मगर ,
हर तस्वीर के लिए दिल दीवार न था

वो वक्त और था , जब किसी से प्यार न था

बात निगाहों से होकर दिल तक पहुँचेगी,
इल्म इसका हमको सरकार न था
खता होनी थी सो हो गई निगाहों से ,
दोनों में कोई कसूरवार न था

वो वक्त और था , जब किसी से प्यार न था .............

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शोभित जैन
जय हिंद दोस्तों,
आख़िर एक लंबे इंतज़ार और बहुत सी टालमटोल के बाद वो दिन आ ही गया जब मैं इस यात्रा की शुरूआत कर रहा हूं इस यात्रा का जिसका न तो आज कोई रास्ता निर्धारित है और ना ही कोई मंजिल का पता बस उद्देश है की आप सबके और करीब आ सकूँ
आपका प्यार, आशीर्बाद, सहयोग और मार्गदर्शन की अपेक्षा के साथ आपका :-
शोभित जैन