४ फरबरी २००८ : चेन्नई एअरपोर्ट
लो भाई आख़िर एक किसान का बेटा आज एयरपोर्ट तक पहुँच ही गया...ट्रक्टर से एयरबस तक के सफर की कुछ खट्टी मीठी यादें अपने सूटकेस में भरकर, उसका एक हिस्सा हाथों में थामे हकीकत की ज़मीन पर घिसटते हुए मैं एअरपोर्ट की लॉबी मैं घुस गया....पर बहुत खोजने पर भी पहली उड़ान का उत्साह खोज नही पाया...शायद तन्हाई का अहसास उस उमंग पर भारी पड़ गया था........
नियत समय पर नियत स्थान से होते हुए नियत सीट पर बैठ गया...सब कुछ नियत....दिल मे बैठे बच्चे को खेलने की कोई जगह नहीं.........पता नही इंसान मशीनों को चला रहे है या मशीनें इंसानों को.....खैर......
नकली मुस्कान चेहरे पर चिपकाये लोगों के द्वारा स्वागत हुआ...और थोडी देर मे सीट बेल्ट बांधने का निर्देश आ गया......और उड़ने की खवाहिश ने ज़माने की रवायतों को अपने चारों ओर लपेट लिया........और फिर धीरे धीरे उड़ान की आकांक्षा मे ज़िन्दगी पहियों की तरह घिसने लगी......जैसे-जैसे यान रफ़्तार पकड़ रहा था चीज़ें पीछे छूट रही थीं......शायद गति का एक नियम ये भी है की हम जितने गति से आगे बढ़ते हैं उतनी ही गति से चीजें पीछे छूट जाती हैं, और जो चीज जितने नज़दीक होती है वो सबसे पहले और सबसे तेज़ जुदा होती है..और जो हमसे जितने फासले पर होता है उतना देर हमारे साथ रहता है........ धीरे - धीरे लुका- छिपी खेलने वाले मकान, फर्राटे से बाइक दौड़ने वाली सड़कें, और जश्न मनाने वाले शहर छोटे होते होते नज़रों से ओझल हो गए और पहुँच गए हम आकाश के अनंत ऊँचाई को मापने.........ऊँचाई चंद पलों की

जब हम उदास या अकेले होते हैं तो यादों की टॉर्च लेकर बचपन के गलियारों में खो जाने को दिल करता है एक बार उनही गलियारों में भटकते-भटकते और जगजीत सिंह जी की ग़ज़ल "वो कागज़ की कश्ती " गुनगुनाते हुए स्वतः ही हाथ चल पड़े और तुकबंदी हो गई
अगर मेरी यह छोटी सी कोशिश आपके दिल में भी कोई भूली बिसरी याद और होंठों पर मुस्कान बिखेर दे तो भले ही टिपण्णी न देना पर कुछ फुर्सत के पल उन यादों को ज़रूर देना
बकवास बंद, ग़ज़ल शुरू :-
ये प्रोफाइल भी ले लो , ये पैकेज भी ले लो
भले छीन लो मुझसे मेरी कंपनी॥
मगर मुझको लौटा दो, खाकी वो वर्दी,
वो स्कूल की मस्ती, वो यादें सुहानी 1
वो स्कूल की सबसे पुरानी निशानी
वो टंकी जहाँ से बच्चे लाते थे पानी,
वो पानी के संग में बाथरूम को जाना
बिना नहाये फिर बाहर को आना,
भुलाये नहीं भूल सकता है कोई ,
वो विनोद तिवारी, वो अश्विन गिलानी
वो स्कूल की मस्ती, वो यादें सुहानी 2
वो पीटी परेड से बच कर निकलना,
BMW के समोसे पर दिल का मचलना
वो ड्रिल के पहले से एडी पटकना,
वो ग्रेस के पहले ही केक झपटना
वो PREP के टाइम की प्यारी सी नींदें,
वो गालों पर सीनियर के गुस्से की निशानी
वो स्कूल की मस्ती, वो यादें सुहानी
कड़ी धुप में वो आउटिंग निकलना,
वो झंकार, वो आकृति पीटी वीटी भटकना
वो ICH में जाकर डोसा उडाना ,
वो कॉमिक वाले पर उधारी चढाना
वो बनारसी की चाट में चटनी का होना,
वो चोरी की रोटी, चार दिन पुरानी
वो स्कूल की मस्ती, वो यादें सुहानी
ये प्रोफाइल भी ले लो , ये पैकेज भी ले लो
भले छीन लो मुझसे मेरी कंपनी॥
मगर मुझको लौटा दो, खाकी वो वर्दी,
वो स्कूल की मस्ती, सात साल की कहानी
आपका :- २६३५
उस दिन जब 'चौथे स्तम्भ' ने बताया और दिखाया,
अपने भाइयों का बहता खून , तो बहुत गालियाँ दी
उन दहशतगर्दों को....
फिर अगले दिन 'सिर्फ़ उन्होंने' उजागर कीं
वो खामियां जिनके कारण वो हमारे घर में घुस पाए,
अब मेरी गालियाँ का रुख बदल गया था...
फिर 'सबसे तेज़' के माध्यम से देखा प्रजातंत्र के
कर्णधारों की नपुंसकता और बेलगाम जुबान,
और मैं लग गया 'नेता' से बड़ी किसी गाली की खोज में....
पर जब 'वो' चिल्ला चिल्ला कर बता रहे थे,
आतंक की जड़ो को, जो छिपी हैं॥
दुबई में बैठे आका के नेटवर्क में....
पड़ोस में स्थित किसी जेहादी शिविर में....
या पड़ोस के किसी खुफियातंत्र के
खुराफाती दिमाग में....
तब मैं कुछ देर के लिए ख़ुद में खो गया,
'आतंक की असली जड़ो' को तलाशने
आज मैंने किसी को गाली नहीं दी.....
आख़िर ख़ुद को गाली देना आसान नहीं होता
रचनाकार :-
एक गैरजिम्मेदार नागरिक...