शोभित जैन
कुछ समय पहले लिखी हुई ये नज़्म मुझे आज भी उतनी ही ताज़ा लगती है जितनी ये पहली बार पढने में लगी थी....आशा है आप लोगो को भी पसंद आएगी !!

काफिर नही होता...

जिस चेहरे को हया का रंग हासिल नहीं होता,
वो नाम हुस्न वालो में शामिल नहीं होता !!१!!

हुस्न की चाहत ही खुदा की इबादत है,
मानते गर तुम, तो मैं काफिर नही होता !!२!!

मुहब्बत पाने दिल में हिम्मत चाहिए हुज़ूर,
तोहफे की शक्ल में इश्क हाज़िर नही होता !!३!!

खताएं तो होंगी , गर आशिकी ताज़ा है॥
क्योंकि जो सच्चा होता है, वो माहिर नहीं होता !!४!!

पन्ने तो कई रंगे स्याही से, पर
जिसपर लिखा उसी पर जाहिर नही होता !!५!!


(दोस्तों, आज सभी ब्लॉगर बंधुओं से माफ़ी मांगने का दिल कर रहा है, क्यूंकि पिछले कुछ समय से अतिव्यस्तता के चलते किसी भी रचना पर अपनी टिपण्णी नहीं दे पाया हूँ.. बहुत से रचनाकारों के तराशे हुए नायाब मोतियों को अपनी "google reader list " के जरिये पढ़ तो रहा हूँ पर उसके आनंद को व्यक्त नही कर पा रहा हूँ.......)

क्षमाप्रार्थी:-
शोभित जैन
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शोभित जैन
पिछली पोस्ट पर आदरणीया संगीता पुरी जी की एक टिपण्णी मिली....टिपण्णी क्या एक प्रश्न पुछा था

बस उसी का जबाब देने की कोशिश की है इस पोस्ट
में.......



मयस्सर नहीं था...

जिसके बिना ज़िंदगी में मेरा गुज़र नही था,

बस वही तो इस जहाँ मे मयस्सर नहीं था !!१!!



दिल में संजो रखूं यादों को,

सुहाना ऐसा तो कोई सफर नही था !!२!!



ऐश की ज़िंदगी बिताते रहे बंगलों में,

सुकून की साँस लेने कोई घर नहीं था !!३!!



साँसे टूटी मंजिल से कुछ फासले पर,

चन्द लम्हों का खुदा को सबर नहीं था !!४!!



ज़िंदगी भर भटका आसरे की तलाश में,

लोग कहते रहे की वो बेघर नहीं था !!५!!
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शोभित जैन

४ फरबरी २००८ : चेन्नई एअरपोर्ट

लो भाई आख़िर एक किसान का बेटा आज एयरपोर्ट तक पहुँच ही गया...ट्रक्टर से एयरबस तक के सफर की कुछ खट्टी मीठी यादें अपने सूटकेस में भरकर, उसका एक हिस्सा हाथों में थामे हकीकत की ज़मीन पर घिसटते हुए मैं एअरपोर्ट की लॉबी मैं घुस गया....पर बहुत खोजने पर भी पहली उड़ान का उत्साह खोज नही पाया...शायद तन्हाई का अहसास उस उमंग पर भारी पड़ गया था........

नियत समय पर नियत स्थान से होते हुए नियत सीट पर बैठ गया...सब कुछ नियत....दिल मे बैठे बच्चे को खेलने की कोई जगह नहीं.........पता नही इंसान मशीनों को चला रहे है या मशीनें इंसानों को.....खैर......

नकली मुस्कान चेहरे पर चिपकाये लोगों के द्वारा स्वागत हुआ...और थोडी देर मे सीट बेल्ट बांधने का निर्देश आ गया......और उड़ने की खवाहिश ने ज़माने की रवायतों को अपने चारों ओर लपेट लिया........और फिर धीरे धीरे उड़ान की आकांक्षा मे ज़िन्दगी पहियों की तरह घिसने लगी......जैसे-जैसे यान रफ़्तार पकड़ रहा था चीज़ें पीछे छूट रही थीं......शायद गति का एक नियम ये भी है की हम जितने गति से आगे बढ़ते हैं उतनी ही गति से चीजें पीछे छूट जाती हैं, और जो चीज जितने नज़दीक होती है वो सबसे पहले और सबसे तेज़ जुदा होती है..और जो हमसे जितने फासले पर होता है उतना देर हमारे साथ रहता है........ धीरे - धीरे लुका- छिपी खेलने वाले मकान, फर्राटे से बाइक दौड़ने वाली सड़कें, और जश्न मनाने वाले शहर छोटे होते होते नज़रों से ओझल हो गए और पहुँच गए हम आकाश के अनंत ऊँचाई को मापने.........ऊँचाई चंद पलों की

शोभित जैन
ये है ब्लॉगजगत और हम सब ब्लॉगर.....पर ये है क्या और क्यूँ हम अपना समय यहाँ लगाते हैं....क्या ये एक ज़िम्मेदारी है ? या एक सुविधा ? या एक हथियार कुछ भी करने के लिए, कुछ भी कहने के लिए.......इसी उधेड़बुन में बहुत समय खपा दिया.....पर जब मंथन हुआ है तो गरल या अमृत कुछ तो निकलना ही था तो कुछ निकला...और जो निकला वो आपके सामने रख रहा हूँ....पता नहीं ये क्या है...पर जो भी है आपके सामने है..पढिये और हो सके तो मुझे भी बताइए....
जहाँ तक मेरा विचार है तो मुझे लगता है की हम लोग इस ब्लॉगजगत में भी ज़िन्दगी को कुछ अलग तरह से जी सकते हैं...कुछ इस तरह.....

चलो ज़िन्दगी को लफ्जों में सजाएं...
सुख को जोडें, दुःख घटाएं....

शब्दों को तपाकर मलहम कर दें, फिर

किसी के आँसू चुराएँ , किसी के दर्द सहलाएं...
चलो ज़िन्दगी को...


सच को कहना हुनर ही नहीं जिगर भी है,

आओ आइना बनें , समाज को शक्ल दिखाएं...
चलो ज़िन्दगी को...


ये सफर ख़त्म नहीं होगा, किसी मंजिल के बाद
कभी रास्तों की नियामत निहारें, थोड़ा सुस्तायें...
चलो ज़िन्दगी को...

हम क़द्र करते हैं तुम्हारे हुनर की,
छोटी सी टिपण्णी से उसे भी बताएं...
चलो
ज़िन्दगी को...

चलो ज़िन्दगी को लफ्जों में सजाएं...
सुख को जोडें, दुःख घटाएं....
लेबल: 11 टिप्पणी |
शोभित जैन
कल शाम को पिछले कुछ महीने की जमा-पूंजी पर एक बार फिर से हमला हुआ, और एक बार फिर से मेरी तनख्वा अप्रत्याशित खर्चे की भेंट चढ़ गई और मेरे हाथ में रह गया मुझे मुहँ चिढाता हुआ "Zero Balance", तब मुझे मजबूर होकर हिन्दी फ़िल्म से ये शेर चुराना पड़ा (भावनाओं को समझो, वो मेरी अपनी हैं) :-


अपने हिस्से का खर्च तो हम कर चुके चुन्नी बाबु,
बस कुछ बचत का ख्याल करते हैं
क्या कहें इन दुनिया वालों को,
जो आखरी पैसे पर भी ऐतराज़ करते हैं १


और
जब इतने से भी दिल की भड़ास पूरी नही हुई तो एक और शेर चुरा डाला......गौर फरमाइयेगा.....


मैंने जब जब कुछ बचाने की पूरी शिद्दत से कोशिश की है
सारी कायनात ने उसे खर्च करवाने की साजिश की है २

(फिर दिल में ख्याल आया- "नौकरी अभी बाकी है मेरे दोस्त" )
शोभित जैन

जब हम उदास या अकेले होते हैं तो यादों की टॉर्च लेकर बचपन के गलियारों में खो जाने को दिल करता है एक बार
उनही गलियारों में भटकते-भटकते और जगजीत सिंह जी की ग़ज़ल "वो कागज़ की कश्ती " गुनगुनाते हुए स्वतः ही हाथ चल पड़े और तुकबंदी हो गई

अगर मेरी यह छोटी सी कोशिश आपके दिल में भी कोई भूली बिसरी याद और होंठों पर मुस्कान बिखेर दे तो भले ही टिपण्णी न देना पर कुछ फुर्सत के पल उन यादों को ज़रूर देना
बकवास बंद, ग़ज़ल शुरू :-
ये प्रोफाइल भी ले लो , ये पैकेज भी ले लो
भले छीन लो मुझसे मेरी कंपनी॥
मगर मुझको लौटा दो, खाकी वो वर्दी,
वो स्कूल की मस्ती, वो यादें सुहानी 1

वो स्कूल की सबसे पुरानी निशानी
वो टंकी जहाँ से बच्चे लाते थे पानी,
वो पानी के संग में बाथरूम को जाना
बिना नहाये फिर बाहर को आना,
भुलाये नहीं भूल सकता है कोई ,
वो विनोद तिवारी, वो अश्विन गिलानी

वो स्कूल की मस्ती, वो यादें सुहानी 2

वो पीटी परेड से बच कर निकलना,
BMW के समोसे पर दिल का मचलना
वो ड्रिल के पहले से एडी पटकना,
वो ग्रेस के पहले ही केक झपटना
वो PREP के टाइम की प्यारी सी नींदें,
वो गालों पर सीनियर के गुस्से की निशानी

वो स्कूल की मस्ती, वो यादें सुहानी

कड़ी धुप में वो आउटिंग निकलना,
वो झंकार, वो आकृति पीटी वीटी भटकना
वो ICH में जाकर डोसा उडाना ,
वो कॉमिक वाले पर उधारी चढाना
वो बनारसी की चाट में चटनी का होना,
वो चोरी की रोटी, चार दिन पुरानी
वो स्कूल की मस्ती, वो यादें सुहानी

ये प्रोफाइल भी ले लो , ये पैकेज भी ले लो
भले छीन लो मुझसे मेरी कंपनी॥
मगर मुझको लौटा दो, खाकी वो वर्दी,
वो स्कूल की मस्ती, सात साल की कहानी


आपका :- २६३५


शोभित जैन

उस दिन जब 'चौथे स्तम्भ' ने बताया और दिखाया,
अपने भाइयों का बहता खून , तो बहुत गालियाँ दी
उन दहशतगर्दों को....

फिर अगले दिन 'सिर्फ़ उन्होंने' उजागर कीं
वो खामियां जिनके कारण वो हमारे घर में घुस पाए,
अब मेरी गालियाँ का रुख बदल गया था...

फिर 'सबसे तेज़' के माध्यम से देखा प्रजातंत्र के
कर्णधारों की नपुंसकता और बेलगाम जुबान,
और मैं लग गया 'नेता' से बड़ी किसी गाली की खोज में....

पर जब 'वो' चिल्ला चिल्ला कर बता रहे थे,
आतंक की जड़ो को, जो छिपी हैं॥
दुबई में बैठे आका के नेटवर्क में....
पड़ोस में स्थित किसी जेहादी शिविर में....
या पड़ोस के किसी खुफियातंत्र के
खुराफाती दिमाग में....

तब मैं कुछ देर के लिए ख़ुद में खो गया,
'आतंक की असली जड़ो' को तलाशने

आज मैंने किसी को गाली नहीं दी.....
आख़िर ख़ुद को गाली देना आसान नहीं होता

रचनाकार :-
एक गैरजिम्मेदार नागरिक...
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