शोभित जैन
जब इंतज़ार बेसबर होता है ,
प्यार और भी मुखर होता है ||

शोभित जैन
जब इंतज़ार ही सफ़र होता है ,
हौले-हौले दिल पत्थर होता है ||
शोभित जैन
जिसे खोजने में ज़माने लगे ,
उसके ख्वाब अब डराने लगे १

वैसे मिलना तो अब मुनासिब नहीं रहा,
पर वो खवाबों में आने-जाने लगे २

आरजू, इजहार, उम्मीद औ मोहब्बत,
खुद, कहीं गहरे दफ़नाने लगे ३

तराशा था हर नगीना, एहतियात से ,
आज खाली सब खज़ाने लगे ४

दर्द आखों से होकर, कागज़ पर बिखर गया,
वो बेफिक्र होकर गुनगुनाने लगे ५
शोभित जैन
तुमने मेरे सपनों को समझा ,
मेरे करीबी , अपनों को समझा !!

पैदाइशी फितरत को समझा ,
तारे, राशी , नक्षत्र को समझा !!

खामोश उदासी, तन्हाई को समझा ,
ज़माने की रुसवाई को समझा !!

सीमायें समझी , हक को समझा ,
फ़िज़ूल सी बक-बक को समझा !!

एक बेचारा दिल बच गया ,
जिसको छोड़कर सबको समझा !!
शोभित जैन

दिल को रौंदते हैं जो हर रोज़ पैरों तले ,

उन्हें आज भी फूल के टूटने पर दर्द होता है !!

शोभित जैन

मिलो तो सीने में समां जाना, ज़माने को भूलकर ,

कब से मेरी बाँहों का घेरा उदास है ||

शोभित जैन

हसरत मुद्दतों से है कि अपना भी परिवार हो ....

साथ में हो अपनी "परी " और अच्छा सा "BAR" हो ||