शोभित जैन
अपने दिल की धड़कन को परखने भी नहीं देते,
धड़का देते हैं दिल, और फिर धडकने भी नहीं देते !!
शोभित जैन
उम्मीदों के बादल को वो कुछ यूँ हटा देते हैं  । 
लिखते हैं, और लिखते लिखते मिटा देते हैं ॥ 
शोभित जैन
दिल के एक कोने में  इतना अन्धकार रहा  था  ।।
कि, उम्मीद के रोशनदान को भी ये नकार रहा  था  ।।
शोभित जैन
मुझे पिज्जा नहीं भाता मैंने ज्वार चखा है ,
माटी की खुशबू को जेहन में संभाल रखा है |
इंसान हूँ इंसान को इंसान समझता हूँ,
इसीलिए तो तखल्लुस अपना
"गँवार" रखा है ||
शोभित जैन
तारीखों के बदलने का क्या जश्न मनाएं,
कभी हालात बदलेंगे को सोचा जायेगा !!


शोभित जैन
खुशियों की उम्मीद तो पहले ही दफ़न हो गयी,
अब तो ये दर्द है कि कोई दर्द नहीं होता !!
शोभित जैन
तमन्ना--ख़ुशी है मगर तन्हाई बहुत है ,
हम-कदम बनना चाहते हो मगर खाई बहुत है !!
ख़ुशी के एक पल से भी अब डर सा लगता है,
जानता जो हूँ, कि कीमत दुखदायी बहुत है !!
शोभित जैन
सच है, अकेले में तेरी बहुत याद आती है !
दर्द है, यादों में तू अकेले नहीं आती !!
शोभित जैन
बहुत आसाँ है जिस्मो--जाँ हासिल करना,
बहुत मुश्किल है दिल--गुमाँ हासिल करना
शोभित जैन
टूटे दिल के आईने मैं अपना अक्स ना देखो 'शोभित
तुम्हे अपना चेहरा भी टुकड़े-टुकड़े दिखाई देगा !!
शोभित जैन
जुदाई ही मुकद्दर है तो इतनी दूरी भी देना, खुदा
मैं अगर तडपूं तो उसे दर्द ना हो
!!
शोभित जैन
मेरे अश्कों की कीमत वो जानती है, तभी
हर रोज़ मुझे ये कीमती सौगात देती है ....
शोभित जैन
एक जाये दूजा आ जाये

हैं जी के जंजाल बहुत ॥

मैं कैसे तुझसे प्यार करूँ ??


पेट्रोल संग प्याज रुलाये ,

महंगी हो गयी दाल बहुत ॥

मैं कैसे तुझसे प्यार करूँ ??


चैन के दो पल मयस्सर नहीं

सर पे सवार हैं काल बहुत ॥

मैं कैसे तुझसे प्यार करूँ ??



ऐसा नहीं वैसा होता ,

दिल में हैं सवाल बहुत ॥

मैं कैसे तुझसे प्यार करूँ ??
शोभित जैन
जब इंतज़ार बेसबर होता है ,
प्यार और भी मुखर होता है ||

शोभित जैन
जब इंतज़ार ही सफ़र होता है ,
हौले-हौले दिल पत्थर होता है ||
शोभित जैन
जिसे खोजने में ज़माने लगे ,
उसके ख्वाब अब डराने लगे १

वैसे मिलना तो अब मुनासिब नहीं रहा,
पर वो खवाबों में आने-जाने लगे २

आरजू, इजहार, उम्मीद औ मोहब्बत,
खुद, कहीं गहरे दफ़नाने लगे ३

तराशा था हर नगीना, एहतियात से ,
आज खाली सब खज़ाने लगे ४

दर्द आखों से होकर, कागज़ पर बिखर गया,
वो बेफिक्र होकर गुनगुनाने लगे ५
शोभित जैन
तुमने मेरे सपनों को समझा ,
मेरे करीबी , अपनों को समझा !!

पैदाइशी फितरत को समझा ,
तारे, राशी , नक्षत्र को समझा !!

खामोश उदासी, तन्हाई को समझा ,
ज़माने की रुसवाई को समझा !!

सीमायें समझी , हक को समझा ,
फ़िज़ूल सी बक-बक को समझा !!

एक बेचारा दिल बच गया ,
जिसको छोड़कर सबको समझा !!
शोभित जैन

दिल को रौंदते हैं जो हर रोज़ पैरों तले ,

उन्हें आज भी फूल के टूटने पर दर्द होता है !!

शोभित जैन

मिलो तो सीने में समां जाना, ज़माने को भूलकर ,

कब से मेरी बाँहों का घेरा उदास है ||

शोभित जैन

हसरत मुद्दतों से है कि अपना भी परिवार हो ....

साथ में हो अपनी "परी " और अच्छा सा "BAR" हो ||