शोभित जैन
ईद मुबारक,
बाकी लोगों का तो पता नहीं पर ये ईद मेरे शायद मुबारक होगी .. ९ दिन की छुट्टी मिली है तो इतनी तो उम्मीद की ही जा सकती है ... Kingdom of Saudi Arabia में होने का ये फायदा तो है.. पुरे ९ दिन का आराम ... हाँ फायदे के साथ कुछ नुकसान भी हैं जैसे ये ९ दिन की छुट्टी तो मिल गयी पर इसमें कुछ करने या कहीं घूमने को है नहीं... बस कुछ नए ब्लॉग शुरू किये हैं उन्ही को समय देने का प्लान है जिनमे एक "Travelog" है एक "Photos " के लिए है और एक दो और ..... इन ब्लोग्स को बनाने का मन तो कई दिनों से था पर समय अब जाकर मिला . अभी नीव तो डाल दी है ईमारत खड़ी करना और रंगरोगन का काम बाकी है .. काम पूरा होते ही आप लोगो के सामने पेश किया जायेगा बाकायदा पार्टी-शार्टी के साथ ...

चलिए जब तक आप लोग इस नयी ग़ज़ल का आनंद लीजिये :-

दूध की बोतल छुट गई , दाम देखकर
दारू साथ ही रह गई , शाम देखकर ॥१॥

मक्कारी , दिखावा झूठ तरक्की पा गए
और काम मिल गया, काम देखकर ॥२॥

सादगी
, सीरत , और अदाएं गज़ब की
मरने को जी चाहता है, इंतजाम देखकर ॥३॥

लाज बचाने की खातिर , थाने चली गयी
होश फाख्ता हो गए, अंजाम देखकर ॥४॥


चलने की आदत में थकने की फुर्सत कहाँ

रूह को सुकूँ मिलेगा अब तो, 'मुक्तिधाम' देखकर ॥५॥

ये ग़ज़ल लिख तो दी है पर मैं स्वयं इससे पूरी तरह संतुष्ट नहीं हूँ (खासकर आखिरी शेर से) .. अपने अग्रजों से इसे सुधारने के अनुरोध के साथ इसे पोस्ट कर रहा हूँ ...
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शोभित जैन
ये शीर्षक मेरी ग़ज़ल के लिए नहीं मेरे लिए है...क्यूंकि ब्लॉगजगत में मेरा आना जाना बरसाती मेढकों कि तरह ही है ...क्या करें इस खानाबदोश ज़िन्दगी में कभी कभार ही अपने लिए समय चुरा पाते हैं ॥ फिर भी लगता है ये बरसात अगले कुछ महीने चलती रहेगी ... उसके आगे कुछ नहीं कह सकता ... तो चलिए फिर से शुरुआत करते हैं इस ग़ज़ल (ग़ज़ल सिर्फ़ कहने को , मात्रा - व्याकरण का ज्ञान नहीं है ना ) के साथ .....


जिनसे उम्मीद थी , वो दिलासा दे रहे
बुरे दिन फिर नज़र आने लगे !!१!!

हमने तो सच से परदा उठाया था ,
दोस्त नहीं हो सकते, जिन्हें ताने लगे !!२!!

बाहें फैलाकर चंद खुशियाँ माँगी थीं
'गम' ज़माने भर के समाने लगे !!३!!

गाय, चूल्हा , तालाब और 'वो'
उफ़, कैसे कैसे ख्वाब आने लगे !!४!!

कुछ और अज़ीज़ हो गए ज़माने के,
जब से परदेश में कमाने लगे !!५!!


चिट्ठाचर्चा भी देखें : http://anand.pankajit.com/2009/10/blog-post_17.html
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शोभित जैन
मौसी : जय बेटा , तो मैं ये शादी पक्की समझूँ ...

जय : बुरा मत मानना मौसी पर जवान दोस्त का सवाल है ये तो पूछना ही पड़ता है कि लड़की करती क्या है , खर्च कितना करती है ..
मौसी : खर्च करने का जहां तक सवाल है बेटा , एक बार शादी हो जाये पति बच्चों की जिम्मेदारी आ जाये तो खर्च भी कम हो जायेगा ...

जय :तो क्या इसका मतलब यह है कि अभी बहुत खर्च करती है ...
मौसी : अरे नहीं नहीं ये मैंने कब कहा , पर अब रोज़ रोज़ तो घर में meggi बनाकर नहीं खा सकते ना ... कभी कभी तो होटलों में जाना ही पड़ता है .. वैसे वो एक Week में बस चार पॉँच बार ही बाहर का खाना खाती है ...

जय :रोज़ रोज़ Meggi मतलब क्या खाना पकाना भी नहीं आता इतनी कामचोर है ...
मौसी : छि छि कामचोर और वो ऐसा मैंने कब कहा पर Late Night Movie देखने के बाद कोई खाना पका पाता है क्या ?

जय :Late Night movies बस यही एक कमी बच गयी थी तुम्हारी बसंती में ....
मौसी : अरे बेटा एक बार शादी हो गयी तो वो दोस्तों के साथ Disco's में जाना बंद कर देगी , Movies Theater अपने आप बंद हो जायेंगे , वैसे मेरी बसंती लक्ष्मी हैलक्ष्मी ....

जय :एक बात तो माननी पड़ेगी मौसी तुम्हारी बसंती लाख खर्चीली सही पर तुम्हारे मुंह से उसके लिए एक भी गलत शब्द नहीं निकला ...
मौसी : क्या करूँ बेटा मेरा तो दिल ही ऐसा है .... तो मैं ये शादी पक्की समझूँ ...
शोभित जैन

२० जुलाई : ये तारीख आते ही BOSS लोगों को एक ही चीज याद आती है "आम" रसीले आम .... BOSS बोले तो "Boys Of Sainik School"... और इन BOSS लोगों में कई लोग ऐसे हैं जो दुनिया के किसी भी कोने में हों आज के दिन "Mango Party" ज़रूर Enjoy करते हैं क्यूंकि आज है हमारे स्कूल का स्थापना दिवस ...
आप लोगों ने मेरा स्कूल तो देखा होगा न... नहीं ... चलिए कोई बात नहीं इस पेज के साइड में नज़र डाल लीजिये....Slide show का नाम है "घर ही तो था"...यही वो जगह है यहाँ ज़िन्दगी के सबसे सुहाने सात साल बिताये हैं ....इसी जगह ने इन पैरों को दुनिया के उबड़-खाबड़ रास्तों पर चलना सिखाया .. सैनिक छावनियों, युद्धपोतों, पनदुब्बियों से लेकर "२६ जनवरी" पर राजपथ तक का सफ़र सिर्फ और सिर्फ इसी की देन है .... कभी कभी सोचता हूँ तो लगता है कि मेरी सोच, सपने, अहसास, विचार सब यहीं की उपज है और आज भी उसी शिद्दत से इससे जुड़े हुए हैं ... लगता है कि सैनिक स्कूल से तो मैं आठ साल पहले निकल आया पर शायद मेरे अन्दर से सैनिक स्कूल अभी तक नहीं निकला है ....

हो सकता है मेरी ये नज़्म पढ़कर आपको भी मेरी बातों पर विश्वास हो जाये ...


अधूरी ख्वाहिश


जाम , शाम , निगाहें, अदाएं, माना सब आगोश में..
दिल में क्यूँ भला फिर , एक तन्हाई सी पलती है

दौलत, शोहरत, इज्ज़त, मुकद्दर से सब हासिल हुई,
कंधों पर सितारों की कमी लेकिन फिर भी खलती है


गीत, ग़ज़ल, छन्द, नज़्म, छोड़ चला मैं जाऊंगा ,
तिरंगा ओढ़ जाने की हसरत दिल में सदा मचलती है


किसी को ज़मीं, आसमां किसी को, बंटवारा शायद हो चुका,
सब कुछ पा लेने की ख्वाहिश, शायद मेरी गलती है


दिल बहलाने को 'शोभित' ख़्याल हमने भी पाल लिया ,
ये दुनिया का दस्तूर है प्यारे , दुनिया यूँ ही चलती है


चलिए चलते चलते इस Vedio पर भी नज़र-ऐ-इनायत करते जाईये , जो हमारे कुछ छोटे भाईयों ने कुछ सुहाने पलों को कैद करके बनाया है ....


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शोभित जैन
काफी दिन हो गए कुछ लिखे हुए, और इन दिनों में काफी कुछ हो भी गया .... जैसे दुबई ( UAE) से तबादला हो गया .. पिरामिडों और nile नदी के देश EGYPT में .. ... एक hindustaan का trip हो गया ..... कुछ दिन अपना शहर इंदौर भी घूम लिया और बहुत सी यादें भी समेट लाये ..... सब कुछ एक ही पोस्ट में लिखना तो मुमकिन नहीं है, इसलिए आज सिर्फ़ इस यात्रा की सबसे खूबसूरत यादों का ज़िक्र करता हूँ .... UAE और EGYPT का ज़िक्र किसी और दिन... (हो सकता है की नए ब्लॉग में... क्यूंकि बहुत दिनों से मन है एक Travel blog बनाने का ) ... चलो मुद्दे की बात पर आते हैं ... तो इस बार इंदौर यात्रा की दो सबसे बड़ी उपलब्धियां रही एक पुरानी डायरी का मिलना और दूसरा एक नए दोस्त का मिलना ... डायरी के पन्ने तो एक एक करके आने वाली पोस्ट में खुलेंगे .... आज की पोस्ट और नज़्म उस मोहतरमा की नज़र करते हैं जिनसे पहली ही मुलाकात में दोस्ती हो गई [ सिर्फ़ दोस्ती :( ]और फिर शतरंज की बिसात पर बातों का ऐसा सिलसिला चला की शाम कब रात में बदल गई, और रात कब सुबह के आगोश में चली गई पता ही नहीं चला ... सुबह जब सूरज की पहली किरण ने झकझोरा तब बातों का सिलसिला टूटा ...... इसलिए इस बार इंदौर से चेन्नई की वापसी यात्रा कठिन भी रही और खुशगवार भी .... चलिए आप लोग भी हमारे साथ यात्रा कीजिये बातें तो होती रहेंगी.....

दाल आधी गल गयी .....

चेहरे पर तन्हाई का आलम अब किस्सा पुराना है,
एक मासूम मुस्कान से इसकी रंगत बदल गई ॥

उससे ही सुकून मिला और कुछ बेकरारी भी,
एक खवाहिश पूरी हुई, एक हसरत मचल गई ॥

मुकम्मल हुआ भरोसा कुछ और मुकद्दर पर
जब देर से ही सही दाल आधी गल गई ॥

जोश था, जूनून था और शायद ज़रुरत भी,
सब कुछ था, बस समय की कमी खल गयी ॥


शह बिना मात मिली पर बाज़ी अधूरी रही,
कमबख्त रात बेसब्र थी, बहुत जल्दी ढल गई ॥
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शोभित जैन
आज यादों के झरोखे से फिर एक कविता (तुकबंदी) निकाल कर लाया हूँ...कालिज कि कैंटीन में चाय पीते पीते बस यूँ ही हाथ चले और कागज पर कुछ लिख दिया ...
आज मन किया तो ब्लॉग पर भी छाप रहा हूँ...

दीदार
सावन के महीने में...जब दिल धड़का था सीने में,
नशा बाकी न बचा पीने में, मजा आने लगा जीने में,
उन दिनों यह बात हुई,
कालेज में पहली मुलाकात हुई...
हुस्न जैसे जमीं पर उतर आया था,
हूर थी या कोई अप्सरा का साया था...
तारीफ को शब्द न मिले किताबों में,
आने लगी फिर वो, हर रात ख्वाबों में...
हर रोज़ वो कालेज में सीढ़ी के पास मिलती थी,
शायद वो किसी का इंतज़ार करती थी..
शायद वो भी किसी से प्यार करती थी,
या खुदा वो उससे यूँ ही प्यार करती रहे..
हर रोज़ उसका वहीँ इंतज़ार करती रहे..
हमारा दिल भी बेकरार होता रहे..
कुछ हो न हो दीदार होता रहे..

या खुदा करना कबूल गर पाकीज़गी हो फरियाद में,
एक हसीं किस्सा जुड़ जायेगा हमारे कालिज कि याद में....

नोट:- इस कविता के सभी पात्र एवं घटनाएं काल्पनिक हैं, यदि किसी जीवित व्यक्ति से इसका सम्बन्ध पाया जाता है तो इसे हमारी खुशकिस्मती समझा जाये (संयोग नहीं)
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शोभित जैन

२३ मार्च २००९ :-

पूरा दिन बीत गया पर चंद ब्लोग्स को छोड़कर शहीद दिवस पर कोई हलचल नज़र नहीं आई ..... आती भी कैसे ये कोई वैलेंटाइन डे थोड़े ही था .... और अपने आस पास जिसको भी इस की अहमियत बताई किसी ने कान नहीं दिया .... तब किसी कवि की ये पक्तियां याद आई

डूबे थे लोग कभी, वन्देमातरम में॥

डूबे तो है आज भी, बन्दे मात्र रम में

कोई साथ न पाकर सोचा चलो शहीद दिवस भी youtube के साथ ही मना लेते हैं ...... फिल्मों के जरिये उन महान लोगों को याद किया और दिन ख़तम .... पर रात भर दो शब्द हथोडे की तरह दिमाग में बजते रहे ... इन्कलाब जिंदाबाद .........

क्या जादू रहा होगा उन दो शब्दों में यही सोचते सोचते आँख लग गई ..... पर सोने से पहले एक सपना देखा (सोने के बाद तो सभी देखते हैं ) ... सपना क्या है एक ज़रूरत है ... ज़रूरत है हमारे देश की ..... कभी आपको भी अपने ज़रूरी कामों से थोडी सी फुर्सत मिले तो सोचना ज़रूर ....... शायद ये आपकी भी जरूरत हो ....

एक और इन्कलाब

चिर निद्रा से जाग पड़ें अब, सुबह का सूरज लाल कर दें

चलो फिर से इन्कलाब कर दें...

चिंगारिया हर जगह छुपी हैं, राख के इस ढेर में,

चलो उठ एक साथ भभकें आग का सैलाब कर दें ....

चलो फिर से इन्कलाब कर दें...

जाति, वर्ण औ क्षेत्र भूलकर, गद्दारों पर टूट पड़ें,

एक ओर 'शोभित' हल्ला बोले, एक तरफ़ इख्लाक कर दें ...

चलो फिर से इन्कलाब कर दें...

घर में गर घुसे रहे तो, घर तलक जल जाएगा,

देहरी लांघें, सड़कें मापें, चौराहों तक फैलाब कर दें ....

चलो फिर से इन्कलाब कर दें...

है नहीं आसाँ बदलना, देश की तकदीर को...

चोट से नहीं वोट से सही, कैसे भी हो कमाल कर दें...

चिर निद्रा से जाग पड़ें अब, सुबह का सूरज लाल कर दें
चलो फिर से इन्कलाब कर दें...

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