शोभित जैन

उस दिन जब 'चौथे स्तम्भ' ने बताया और दिखाया,
अपने भाइयों का बहता खून , तो बहुत गालियाँ दी
उन दहशतगर्दों को....

फिर अगले दिन 'सिर्फ़ उन्होंने' उजागर कीं
वो खामियां जिनके कारण वो हमारे घर में घुस पाए,
अब मेरी गालियाँ का रुख बदल गया था...

फिर 'सबसे तेज़' के माध्यम से देखा प्रजातंत्र के
कर्णधारों की नपुंसकता और बेलगाम जुबान,
और मैं लग गया 'नेता' से बड़ी किसी गाली की खोज में....

पर जब 'वो' चिल्ला चिल्ला कर बता रहे थे,
आतंक की जड़ो को, जो छिपी हैं॥
दुबई में बैठे आका के नेटवर्क में....
पड़ोस में स्थित किसी जेहादी शिविर में....
या पड़ोस के किसी खुफियातंत्र के
खुराफाती दिमाग में....

तब मैं कुछ देर के लिए ख़ुद में खो गया,
'आतंक की असली जड़ो' को तलाशने

आज मैंने किसी को गाली नहीं दी.....
आख़िर ख़ुद को गाली देना आसान नहीं होता

रचनाकार :-
एक गैरजिम्मेदार नागरिक...
लेबल:
6 Responses
  1. तब मैं कुछ देर के लिए ख़ुद में खो गया,
    'आतंक की असली जड़ो' को तलाशने

    आज मैंने किसी को गाली नहीं दी.....
    आख़िर ख़ुद को गाली देना आसान नहीं होता

    ठीक लिखा हम सब को अपनी अपनी ही जड़ों को खोजना होगा, पर याद रखना अन्तिम विजय अपनी ही होगी


  2. वाह.......वाह.......वाह
    कई दिनों बाद एक सार्थक कविता पढने को मिली !
    बहुत ही अच्छी कविता है !
    अत्यन्त सारगर्भित !
    मेरी ढेरों शुभकामनाएं !



  3. बहुत ही सही लिखा है आप ने--
    सोच जगाती और चिंतन का विषय देती हुई सारगर्भित कविता.


  4. varsha Says:

    excellent creation..i feel the same way too.


  5. Vijay Kumar Says:

    आपकी लेखनी समर्थ और संवेदन शील है .मुंबई हमले पर लिखे मेरे गीत को भी देखें और कृतार्थ करें. .


एक टिप्पणी भेजें